'Evolving Earth' जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन का नेतृत्व न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के जियोलॉजिस्ट माइकल रैम्पिनो ने किया है। अध्ययन के अनुसार, ज्वालामुखी विस्फोट, समुद्रों में ऑक्सीजन की भारी कमी, महाद्वीपों की संरचना में बदलाव और जीवों के सामूहिक विलुप्त होने जैसी घटनाएं लगभग 27.5 मिलियन वर्ष (2.75 करोड़ वर्ष) के अंतराल पर दिखाई देती हैं।
आखिर क्या है 2.7 करोड़ साल वाला रहस्यमयी पैटर्न?
पृथ्वी का इतिहास कई महाविनाशों से भरा पड़ा है। कभी विशाल ज्वालामुखियों ने पूरे ग्रह का वातावरण बदल दिया, तो कभी महासागरों में ऑक्सीजन की कमी ने करोड़ों जीवों का अस्तित्व खत्म कर दिया। वैज्ञानिक लंबे समय से यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या इन घटनाओं के पीछे कोई साझा कारण है।
माइकल रैम्पिनो की टीम ने पिछले 26 करोड़ वर्षों में हुई 89 प्रमुख भूवैज्ञानिक घटनाओं का विश्लेषण किया। इसमें समुद्री जीवों का सामूहिक विलुप्त होना, महासागरों में ऑक्सीजन की कमी (Oceanic Anoxic Events), विशाल फ्लड-बेसाल्ट ज्वालामुखी विस्फोट, समुद्र के स्तर में बड़े उतार-चढ़ाव, टेक्टोनिक प्लेटों की गतिविधियां और अन्य भूवैज्ञानिक परिवर्तन शामिल थे।
विश्लेषण में इन घटनाओं के बीच लगभग 27.5 मिलियन वर्ष का दोहराव दिखाई दिया। इसके अलावा लगभग 8.9 मिलियन वर्ष का एक अपेक्षाकृत कमजोर चक्र भी सामने आया।
अध्ययन में 2.75 करोड़ वर्ष के मुख्य चक्र के अलावा लगभग 89 लाख वर्ष का एक दूसरा पैटर्न भी दिखाई दिया। हालांकि यह चक्र उतना स्पष्ट नहीं था और इसमें घटनाओं का मेल अपेक्षाकृत कम मिला, इसलिए वैज्ञानिक इसे एक कमजोर सांख्यिकीय संकेत मानते हैं।
जब शोधकर्ताओं ने 89 भूवैज्ञानिक घटनाओं का सांख्यिकीय विश्लेषण किया, तो उन्हें दो अलग-अलग आवधिक (periodic) पैटर्न दिखाई दिए:
27.5 मिलियन वर्ष (2.75 करोड़ साल) का एक मजबूत पैटर्न, जिसमें अधिकांश बड़ी घटनाएं अपेक्षाकृत स्पष्ट रूप से समूहों में दिखाई दीं।
8.9 मिलियन वर्ष (89 लाख साल) का एक कमजोर पैटर्न, जिसमें कुछ घटनाएं इस अंतराल के आसपास भी दिखाई दीं, लेकिन उनका मेल 27.5 मिलियन वर्ष वाले चक्र जितना स्पष्ट और लगातार नहीं था।
यहां "कमजोर चक्र" (weaker cycle) का अर्थ है कि:
इस अंतराल पर घटनाओं का दोहराव कम स्पष्ट था।
सभी घटनाएं इस पैटर्न का पालन नहीं करती थीं।
सांख्यिकीय रूप से इसका संकेत मिला, लेकिन इसकी विश्वसनीयता 27.5 मिलियन वर्ष वाले चक्र से कम थी।
2.7 करोड़ साल का यह पैटर्न वैज्ञानिकों को क्यों हैरान कर रहा है?
पृथ्वी के इतिहास में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जिन्होंने पूरे ग्रह का स्वरूप बदल दिया। करीब 6.6 करोड़ साल पहले डायनासोरों का अंत, 25.2 करोड़ साल पहले पर्मियन महाविलुप्ति (The Great Dying), विशाल ज्वालामुखीय विस्फोट, महासागरों में ऑक्सीजन की भारी कमी और महाद्वीपों की बनावट में बड़े बदलाव—ये सभी घटनाएं अलग-अलग समय पर हुईं, लेकिन कई शोधकर्ताओं का मानना है कि इनमें कुछ घटनाएं आश्चर्यजनक रूप से एक निश्चित समयांतराल के आसपास दिखाई देती हैं। माइकल रैम्पिनो के विश्लेषण में पिछले 26 करोड़ वर्षों की 89 प्रमुख भूवैज्ञानिक घटनाओं का अध्ययन करने पर लगभग 27.5 मिलियन वर्ष का दोहराव सामने आया। वैज्ञानिकों के अनुसार यदि पृथ्वी के इतिहास में ऐसे दीर्घकालिक चक्र वास्तव में मौजूद हैं, तो वे ग्रह के विकास, जलवायु परिवर्तन, ज्वालामुखीय गतिविधियों और जैविक विकास को समझने की दिशा में एक नई खिड़की खोल सकते हैं। यही वजह है कि यह अध्ययन भूविज्ञान, खगोल विज्ञान और पृथ्वी विज्ञान के विशेषज्ञों के बीच चर्चा का प्रमुख विषय बन गया है।
पृथ्वी के भीतर चल रही कौन-सी प्रक्रिया बन सकती है इसकी वजह?
रिसर्च के अनुसार इस रहस्य का सबसे मजबूत संबंध पृथ्वी के मेंटल (Mantle) से हो सकता है। मेंटल के भीतर अत्यंत धीमी गति से चलने वाली कन्वेक्शन धाराएं करोड़ों वर्षों तक ऊर्जा और गर्मी का प्रवाह बनाए रखती हैं।
जब इन प्रक्रियाओं में बड़े बदलाव आते हैं, तब—
विशाल ज्वालामुखी विस्फोट शुरू हो सकते हैं।
टेक्टोनिक प्लेटों की गति बदल सकती है।
नए पर्वतों का निर्माण तेज हो सकता है।
समुद्रों का रासायनिक संतुलन बदल सकता है।
वैश्विक जलवायु प्रभावित हो सकती है।
यानी पृथ्वी के भीतर होने वाला एक बड़ा बदलाव सतह, महासागर और जीव-जगत तक असर डाल सकता है।
क्या मिल्की वे गैलेक्सी से भी जुड़ा हो सकता है यह रहस्य?
रैम्पिनो की रिसर्च केवल पृथ्वी तक सीमित नहीं है। उन्होंने अंतरिक्ष से जुड़े संभावित कारणों पर भी ध्यान दिया है।
वैज्ञानिकों के अनुसार हमारा सौरमंडल लगातार मिल्की वे गैलेक्सी के केंद्र की परिक्रमा करता रहता है। इस दौरान यह गैलेक्सी के मध्य भाग के ऊपर और नीचे से गुजरता है। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि इन अवधियों में गुरुत्वाकर्षण प्रभाव बदलने से ऊर्ट क्लाउड में मौजूद धूमकेतुओं की कक्षाएं प्रभावित हो सकती हैं, जिससे पृथ्वी से टकराने वाले बड़े क्षुद्रग्रहों की संभावना बढ़ जाती है।
डार्क मैटर का भी सामने आया दिलचस्प कनेक्शन
एक और रोचक संभावना डार्क मैटर से जुड़ी है। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि सौरमंडल गैलेक्सी के ऐसे हिस्सों से गुजरता है जहां डार्क मैटर अधिक मात्रा में मौजूद हो, तो उसका कुछ प्रभाव पृथ्वी के भीतर ऊर्जा संतुलन पर पड़ सकता है। लंबे समय में यह अतिरिक्त गर्मी मेंटल की गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है और भूवैज्ञानिक बदलावों को गति दे सकती है।
यह विचार अभी वैज्ञानिक शोध का विषय बना हुआ है और भविष्य के अध्ययन इसके बारे में अधिक स्पष्ट तस्वीर दे सकते हैं।
क्या क्षुद्रग्रहों की टक्कर भी इसी चक्र का हिस्सा है?
रिसर्च में यह भी उल्लेख किया गया है कि पृथ्वी पर मौजूद कई बड़े इम्पैक्ट क्रेटर की आयु भी लगभग इसी समय चक्र के आसपास दिखाई देती है। हालांकि इन्हें मुख्य सांख्यिकीय विश्लेषण में शामिल नहीं किया गया, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि इस संभावित संबंध की भविष्य में और गहराई से जांच की जा सकती है।
यदि यह संबंध स्थापित होता है, तो इससे पृथ्वी के भूवैज्ञानिक इतिहास और अंतरिक्षीय घटनाओं के बीच नए संबंध सामने आ सकते हैं।
संजय सक्सैना: इस खोज का महत्व क्या है?
अगर भविष्य के अध्ययन इस दीर्घकालिक चक्र को और मजबूती से स्थापित करते हैं, तो इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि पृथ्वी की आंतरिक प्रक्रियाएं, जलवायु परिवर्तन, महासागरों की संरचना, ज्वालामुखी गतिविधियां और जीवों का विकास करोड़ों वर्षों में किस तरह एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इससे पृथ्वी और ब्रह्मांड के बीच मौजूद जटिल संबंधों पर भी नई जानकारी मिल सकती है।