अंतिम उपवास की सत्य कथा: जी.डी. अग्रवाल से सोनम वांगचुक तक एक चेतावनी | समाज और व्यवस्था से एक असहज सवाल - संजय सक्सैना
एक देश, जो अपनी "माँओं" की पूजा तो करता है, लेकिन उनकी पुकार सुनना भूल जाता है
भारत की आत्मा कुछ शब्दों में बसती है।
माँ।
यह शब्द हमारे लिए केवल एक संबोधन नहीं है। यह श्रद्धा है, भावना है, संबंध है।
हम धरती को
धरती माँ कहते हैं।
गाय को
गौमाता कहते हैं।
नदियों को जीवनदायिनी माँ का दर्जा देते हैं।
और गंगा..
गंगा तो हमारे लिए केवल नदी नहीं,
गंगा मैया है।
करोड़ों भारतीयों के लिए गंगा आस्था, संस्कृति और सभ्यता की धारा है। जन्म से मृत्यु तक, जीवन के हर महत्वपूर्ण पड़ाव पर गंगा किसी न किसी रूप में हमारे साथ रहती है।
लेकिन इतिहास कभी-कभी हमसे एक असहज प्रश्न पूछता है—
क्या किसी को माँ कह देना ही उसके प्रति हमारा कर्तव्य पूरा कर देता है?
या माँ होने का सम्मान उसके संरक्षण, उसकी देखभाल और उसके दर्द को समझने में दिखाई देता है?