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Friday, April 24, 2026

News Desk / News Delhi /April 23, 2026

नई दिल्ली के एक हैंगर में पंक्तिबद्ध खड़े लड़ाकू विमान चमक रहे हैं। उनकी धातु की सतह पर रोशनी पड़ते ही ऐसा लगता है मानो वे किसी भी क्षण आकाश को चीरने के लिए तैयार हों। ये हैं HAL Tejas—भारत की महत्वाकांक्षा, तकनीकी क्षमता और आत्मनिर्भरता के सपने का प्रतीक।
लेकिन इस शांत दृश्य के भीतर एक असहज सच्चाई छिपी है। ये विमान तैयार हैं, पर पूरी तरह “अपने” नहीं हैं। इनकी कहानी केवल भारत की नहीं, बल्कि कई देशों की साझी कहानी है। आइए जानते हैं, संजय सक्सेना, वरिष्ठ विश्लेषक एवं विचारक के इस लेख के माध्यम से।

टेक्नोलॉजी / तेजस: एक विमान, कई देशों की कहानी — आत्मनिर्भरता की परतों के पीछे की सच्चाई - संजय सक्सैना

शुरुआत: एक स्वदेशी सपने की नींव

1990 के दशक में जब भारत ने अपना हल्का लड़ाकू विमान विकसित करने का निर्णय लिया, तब उद्देश्य स्पष्ट था—विदेशी निर्भरता से मुक्ति। Aeronautical Development Agency और Hindustan Aeronautics Limited को यह जिम्मेदारी सौंपी गई कि वे एक ऐसा विमान बनाएं जो भारतीय जरूरतों के अनुरूप हो और भविष्य की चुनौतियों का सामना कर सके।

सालों के अनुसंधान, असफलताओं और सुधारों के बाद जो आकार सामने आया, वह तकनीकी दृष्टि से प्रभावशाली था। तेजस का एयरफ्रेम—उसका ढांचा—भारत में डिजाइन और निर्मित हुआ। हल्के कंपोजिट मटेरियल का उपयोग, एयरोडायनामिक डिजाइन और संरचनात्मक मजबूती—ये सब भारतीय इंजीनियरिंग की उपलब्धि थे।

फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम, विशेषकर डिजिटल फ्लाई-बाय-वायर तकनीक, पूरी तरह स्वदेशी विकसित की गई। यह वह प्रणाली है जो विमान को स्थिर और नियंत्रित रखती है। इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता वास्तव में भारत की बड़ी सफलता मानी जा सकती है।

परतें खुलती हैं: “स्वदेशी” की सीमाएँ

जैसे-जैसे विमान का विकास आगे बढ़ा, यह स्पष्ट होता गया कि हर तकनीक को शून्य से विकसित करना संभव नहीं था। यहीं से तेजस की कहानी एक वैश्विक सहयोग में बदलने लगी।

सबसे पहले बात रडार की। शुरुआती तेजस विमानों में इज़राइल की कंपनियों द्वारा विकसित रडार लगाए गए। बाद में भारत ने “उत्तम” नामक स्वदेशी AESA रडार विकसित करना शुरू किया, लेकिन यह अभी भी क्रमिक रूप से ही शामिल हो रहा है।

इसी तरह इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम—जिसे Swayam Raksha Kavach कहा जाता है—भारत में विकसित अवश्य हुआ, पर इसकी तकनीकी प्रेरणा और आधार पूरी तरह स्वदेशी नहीं थे। यह विकास एक क्रमिक प्रक्रिया का परिणाम था, जिसमें विदेशी अनुभवों का भी योगदान रहा।

एवियोनिक्स, यानी विमान का “मस्तिष्क”, सबसे जटिल क्षेत्र है। यहाँ स्थिति और भी मिश्रित है। कुछ सिस्टम भारत में बने, लेकिन कई महत्वपूर्ण घटक—जैसे टारगेटिंग पॉड, हेलमेट-माउंटेड डिस्प्ले—इज़राइल से लिए गए। इस तरह तेजस का “दिमाग” आंशिक रूप से भारतीय और आंशिक रूप से विदेशी बना रहा।

सबसे बड़ी सच्चाई: इंजन

हर लड़ाकू विमान का हृदय उसका इंजन होता है। और यही वह जगह है जहाँ आत्मनिर्भरता का दावा सबसे कमजोर पड़ जाता है।

तेजस का इंजन पूरी तरह अमेरिकी कंपनी GE Aerospace द्वारा निर्मित है। भारत अभी तक जेट इंजन तकनीक में आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है।

यही कारण है कि जब इंजन की आपूर्ति में देरी होती है, तो पूरी उत्पादन प्रक्रिया प्रभावित हो जाती है। हाल के समय में ऐसी स्थिति भी आई जब कई तेजस विमान निर्माण के बाद तैयार खड़े थे, लेकिन इंजन के अभाव में उन्हें उड़ान के लिए तैयार नहीं किया जा सका।

यह स्थिति केवल एक उत्पादन समस्या नहीं, बल्कि रणनीतिक कमजोरी का संकेत है।

एक जटिल सच्चाई: कितना भारतीय है तेजस?

यदि वस्तुनिष्ठ दृष्टि से देखा जाए, तो तेजस न तो पूरी तरह विदेशी है और न ही पूरी तरह स्वदेशी।
इसका ढांचा, नियंत्रण प्रणाली और कई सॉफ्टवेयर भारतीय हैं।
लेकिन इसके सेंसर, कुछ महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक्स और इंजन विदेशी हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, वर्तमान संस्करणों में इसका स्वदेशी हिस्सा लगभग 60–65 प्रतिशत के बीच है।

इसका अर्थ यह है कि तेजस एक “इंटीग्रेशन प्लेटफॉर्म” है—जहाँ भारत ने विभिन्न देशों की तकनीकों को जोड़कर एक कार्यशील और सक्षम लड़ाकू विमान तैयार किया है।

इज़राइल की भूमिका: एक महत्वपूर्ण अध्याय

तेजस की यात्रा में इज़राइल का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा है। शुरुआती चरणों में रडार, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और टारगेटिंग तकनीक के क्षेत्र में इज़राइल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस सहयोग ने भारत को विकास की गति बढ़ाने में मदद की, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि कुछ क्षेत्रों में निर्भरता बनी रहे।

आत्मनिर्भरता का वास्तविक अर्थ

तेजस की कहानी हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न के सामने खड़ा करती है—आत्मनिर्भरता का वास्तविक अर्थ क्या है?
क्या केवल एक विमान का निर्माण कर लेना पर्याप्त है?
या फिर उसकी हर महत्वपूर्ण तकनीक का स्वामित्व भी आवश्यक है?

जब तक इंजन, सेंसर और अन्य महत्वपूर्ण प्रणालियाँ पूरी तरह स्वदेशी नहीं होतीं, तब तक आत्मनिर्भरता अधूरी ही मानी जाएगी।

संजय सक्सेना, वरिष्ठ विश्लेषक एवं विचारक - उपलब्धि भी, चुनौती भी

तेजस को केवल आलोचना की दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। यह भारत की तकनीकी क्षमता, धैर्य और जटिल प्रणालियों को एकीकृत करने की योग्यता का प्रमाण है।

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यह परियोजना हमें हमारी सीमाओं का एहसास कराती है।

तेजस एक उपलब्धि है—पर पूर्ण आत्मनिर्भरता नहीं।
यह एक मजबूत कदम है—पर मंजिल अभी दूर है।

जिस दिन भारत अपने लड़ाकू विमानों के इंजन और सभी महत्वपूर्ण प्रणालियाँ स्वयं विकसित कर लेगा, उसी दिन यह कहानी पूरी होगी। तब तक, तेजस केवल एक विमान नहीं, बल्कि एक यात्रा है—आत्मनिर्भरता की ओर, जिसमें मंजिल से अधिक महत्वपूर्ण उसका मार्ग है।

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