सिर्फ अमेरिकी डॉलर ही नहीं, बल्कि ब्रिटिश पाउंड, यूरो, मलेशियाई रिंगिट और कई एशियाई मुद्राओं के मुकाबले भी रुपया कमजोर हुआ है। हालात ऐसे हैं कि विदेश यात्रा, पढ़ाई, तेल आयात, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई जरूरी वस्तुएँ लगातार महंगी होती जा रही हैं।
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), NSE RBI Reference Rate डेटा, XE Currency Data और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाज़ारों के अनुसार 2014 से 2026 के बीच रुपया ऐतिहासिक गिरावट के दौर से गुजरा है।
2014 से 2026: रुपये की गिरावट का पूरा गणित :
- 2014: शुरुआत 58.94 प्रति डॉलर से :
मई 2014 में नई सरकार बनने के समय 1 अमेरिकी डॉलर लगभग 58.94 रुपए के बराबर था। उस समय भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिर माना जा रहा था और विदेशी निवेश में भी उत्साह था।
- 2019: रुपया 69 के पार :
पाँच वर्षों में रुपया गिरकर लगभग 69.37 प्रति डॉलर तक पहुँच गया। यानी 2014 से 2019 के बीच रुपए में लगभग 17 प्रतिशत की गिरावट आई।
- इसके पीछे कई कारण बताए गए :
- कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें
- अमेरिका में ब्याज दरों में बढ़ोतरी
- विदेशी निवेश में उतार-चढ़ाव
- बढ़ता व्यापार घाटा
RBI और ऐतिहासिक विनिमय दर डेटा के अनुसार 2018-19 तक डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर हो चुका था।
2020 के बाद रुपया क्यों ज्यादा टूटा? :
कोविड महामारी के बाद दुनिया की लगभग सभी अर्थव्यवस्थाएँ प्रभावित हुईं। लेकिन भारत में स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो गई क्योंकि:
• तेल आयात बिल तेजी से बढ़ा
• रूस-यूक्रेन युद्ध ने ऊर्जा संकट बढ़ाया
• अमेरिका ने ब्याज दरें बढ़ाईं
• डॉलर दुनिया की “सेफ करेंसी” बन गया
2022 के बाद अमेरिकी फेडरल रिजर्व की सख्त मौद्रिक नीति के कारण विदेशी निवेश उभरते बाजारों से निकलकर अमेरिका जाने लगा। इसका असर भारतीय मुद्रा पर भी पड़ा।
Trading Economics और वैश्विक मुद्रा डेटा के अनुसार 2025-26 के दौरान रुपया 95-96 प्रति डॉलर तक पहुँच गया जबकि कुछ समय यह 99 के करीब भी गया।
इस तरह 2014 की तुलना में भारतीय रुपया लगभग 60 प्रतिशत से अधिक कमजोर हो चुका है।
केवल डॉलर नहीं, अन्य मुद्राओं के सामने भी कमजोर हुआ रुपया
- 1. मलेशियाई रिंगिट में ऐतिहासिक मजबूती :
हाल के महीनों में मलेशिया की मुद्रा रिंगिट में तेज मजबूती देखने को मिली है। इसके पीछे मुख्य कारण बताए जा रहे हैं:
- इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में उछाल
- विदेशी निवेश में वृद्धि
- चीन से सप्लाई चेन शिफ्ट होने का फायदा
- मलेशिया के सेमीकंडक्टर सेक्टर का विस्तार
जहाँ भारतीय रुपया दबाव में रहा, वहीं रिंगिट ने कई चरणों में डॉलर के मुकाबले मजबूती दिखाई। इससे भारत के लिए मलेशिया से आयात महंगे हुए।
विशेषज्ञ मानते हैं कि दक्षिण-पूर्व एशिया की अर्थव्यवस्थाओं ने निर्यात-आधारित मॉडल को अधिक मजबूती से अपनाया जबकि भारत अब भी भारी आयात आधारित अर्थव्यवस्था बना हुआ है।
- 2. ब्रिटिश पाउंड के सामने भी गिरावट :
2014 में 1 ब्रिटिश पाउंड लगभग 98 रुपए के आसपास था।
2026 में यही दर 125 से 129 रुपए तक पहुँच चुकी है।
इसका असर सबसे ज्यादा इन क्षेत्रों पर पड़ा:
- ब्रिटेन में पढ़ाई करने वाले भारतीय छात्र
- विदेश यात्रा
- आयातित मशीनरी
- विदेशी शिक्षा लोन
- 3. यूरो के सामने भी कमजोर रुपया :
2014-15 में 1 यूरो लगभग 77-80 रुपए था।
2026 तक यह 110 रुपए के पार पहुँच गया।
यूरोप से आयात होने वाले उत्पादों और मशीनरी पर इसका असर पड़ा।
- 4. एशियाई मुद्राओं के मुकाबले भी दबाव :
वियतनाम, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों ने निर्यात और मैन्युफैक्चरिंग में तेज़ बढ़त हासिल की है। कई विदेशी कंपनियाँ चीन से निकलकर इन देशों में जा रही हैं।
भारत अभी भी विनिर्माण क्षेत्र में अपेक्षित गति हासिल नहीं कर पाया है। इसका असर विदेशी निवेश और मुद्रा स्थिरता दोनों पर पड़ता है।
क्या नोटबंदी ने भी रुपए की कमजोरी में भूमिका निभाई? :
भारतीय रुपए की गिरावट पर चर्चा होती है तो आमतौर पर कच्चे तेल, डॉलर और विदेशी निवेश की बात होती है। लेकिन कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि 2016 की नोटबंदी ने भारतीय अर्थव्यवस्था की गति को प्रभावित किया, जिसका असर लंबे समय में रुपए की मजबूती पर भी पड़ा।
8 नवंबर 2016 को सरकार ने 500 और 1000 रुपए के पुराने नोट बंद करने की घोषणा की थी। उस समय देश की लगभग 86 प्रतिशत नकदी अचानक चलन से बाहर हो गई थी।
सरकार ने इसके पीछे काले धन, नकली नोट और आतंक फंडिंग रोकने को प्रमुख कारण बताया था। लेकिन बाद में RBI और कई आर्थिक अध्ययनों में इसके आर्थिक प्रभावों पर गंभीर सवाल उठे।
नोटबंदी के बाद अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ा? :
नकदी आधारित अर्थव्यवस्था को झटका
- भारत की बड़ी आबादी और छोटे व्यवसाय नकद लेनदेन पर निर्भर थे। नोटबंदी के बाद: :
- छोटे व्यापार प्रभावित हुए
- ग्रामीण बाजारों में मांग घटी
- असंगठित क्षेत्र को नुकसान हुआ
- MSME सेक्टर कमजोर हुआ
- रोजगार प्रभावित हुआ
CMIE और कई आर्थिक रिपोर्टों में बताया गया कि नोटबंदी के बाद रोजगार और उपभोग दोनों प्रभावित हुए।
- GDP वृद्धि दर में गिरावट :
नोटबंदी के बाद भारत की आर्थिक वृद्धि दर में नरमी देखी गई। कई अर्थशास्त्रियों ने कहा कि अर्थव्यवस्था की “डिमांड” और “कैश फ्लो” दोनों प्रभावित हुए।
पूर्व RBI गवर्नर रघुराम राजन समेत कई विशेषज्ञों ने माना कि नोटबंदी का अल्पकालिक आर्थिक झटका काफी बड़ा था।
क्या इससे रुपए पर दबाव बढ़ा? :
सीधे तौर पर नोटबंदी के कारण रुपया नहीं गिरा, लेकिन कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इस फैसले ने भारतीय अर्थव्यवस्था की गति को धीमा किया, जिससे:
• निवेश भावना प्रभावित हुई
• छोटे उद्योग कमजोर हुए
• उपभोग घटा
• विकास दर पर असर पड़ा
जब किसी अर्थव्यवस्था की विकास क्षमता कमजोर दिखती है तो विदेशी निवेशक सतर्क हो जाते हैं। इसका असर लंबे समय में मुद्रा पर भी पड़ सकता है।
RBI रिपोर्ट और नोटबंदी पर बहस :
RBI की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार नोटबंदी के बाद लगभग 99 प्रतिशत बंद किए गए नोट बैंकिंग सिस्टम में वापस लौट आए थे। इसके बाद काले धन पर कार्रवाई को लेकर बहस तेज हो गई।
आलोचकों ने सवाल उठाया कि यदि लगभग पूरा पैसा वापस लौट आया तो नोटबंदी से काले धन पर अपेक्षित प्रभाव क्यों नहीं पड़ा।
क्या पहले भी ऐसा संकट आया था? :
1991 का विदेशी मुद्रा संकट
1991 में भारत के पास केवल कुछ सप्ताह के आयात के बराबर विदेशी मुद्रा बची थी। देश को सोना गिरवी रखना पड़ा था। उस दौर में रुपया तेजी से टूटा था।
2013 का “टेपेर टैंट्रम”
2013 में अमेरिकी फेडरल रिजर्व के संकेतों के बाद विदेशी निवेश भारत समेत कई उभरते बाजारों से बाहर जाने लगा। उस समय रुपया तेजी से गिरकर 68 प्रति डॉलर तक पहुँच गया था।
भारत को उस समय “Fragile Five” देशों में शामिल किया गया था।
आखिर रुपया गिरता क्यों है? :
- 1. भारी तेल आयात :
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। तेल महंगा होने पर डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है।
- 2. व्यापार घाटा :
भारत का आयात लगातार निर्यात से अधिक रहा है। इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ता है।
- 3. विदेशी निवेश का बाहर जाना :
जब अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ती हैं तो निवेशक पैसा अमेरिका में लगाना पसंद करते हैं। इससे भारत जैसे देशों से डॉलर बाहर निकलता है।
- 4. डॉलर की वैश्विक ताकत :
वैश्विक संकट के समय निवेशक डॉलर को सुरक्षित मुद्रा मानते हैं। इससे डॉलर मजबूत होता है और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएँ कमजोर पड़ती हैं।
- 5. घरेलू आर्थिक झटके :
विशेषज्ञों के अनुसार नोटबंदी, महामारी और कमजोर निजी निवेश जैसे घरेलू कारकों ने भी अर्थव्यवस्था की गति को प्रभावित किया।
आम आदमी पर क्या असर? :
- पेट्रोल और डीजल महंगे :
कच्चा तेल डॉलर में खरीदा जाता है। रुपया कमजोर होने पर तेल महंगा पड़ता है।
- विदेश में पढ़ाई महंगी :
ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोप में पढ़ाई करने वाले छात्रों की फीस कई गुना बढ़ जाती है।
- मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स महंगे :
भारत बड़ी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक सामान आयात करता है। रुपया गिरने से इनकी कीमत बढ़ती है।
- विदेश यात्रा महंगी :
हवाई टिकट, होटल और विदेशी खर्च बढ़ जाते हैं।
RBI क्या कर रहा है? :
भारतीय रिजर्व बैंक समय-समय पर डॉलर बेचकर रुपए को संभालने की कोशिश करता है। इसे “मार्केट इंटरवेंशन” कहा जाता है।
RBI के पास अभी भी बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है, लेकिन लगातार डॉलर बेचने की भी एक सीमा होती है।
क्या आगे और गिरेगा रुपया? :
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में कई कारक महत्वपूर्ण होंगे:
• कच्चे तेल की कीमत
• अमेरिकी ब्याज दरें
• वैश्विक युद्ध और तनाव
• विदेशी निवेश
• भारत का निर्यात प्रदर्शन
अगर वैश्विक हालात खराब होते हैं और डॉलर मजबूत बना रहता है तो रुपए पर और दबाव आ सकता है।
संजय सक्सैना - सबसे बड़ा सवाल ! :
भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की तैयारी कर रहा है। सरकार आर्थिक विकास के बड़े दावे कर रही है। लेकिन उसी दौरान भारतीय रुपया लगातार कमजोर हो रहा है।
सवाल यह है:
अगर अर्थव्यवस्था मजबूत है तो मुद्रा कमजोर क्यों है?
क्या भारत की विकास कहानी केवल GDP तक सीमित है?
क्या निर्यात, विनिर्माण और विदेशी मुद्रा स्थिरता के मोर्चे पर अभी भी बड़ी चुनौतियाँ मौजूद हैं?
लगातार गिरता रुपया अब सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुका है।