इसी संदर्भ में ‘जनिका’ एक ऐसी लघु एवं सरल काव्य-विधा के रूप में सामने आती है, जो अल्प शब्दों में चमत्कारिक प्रभाव उत्पन्न करने की क्षमता रखती है। संकेत मात्र से भावों की व्यापक अनुभूति कराने वाली यह विधा धीरे-धीरे साहित्य के धरातल पर अपनी पहचान बना रही है।
जनिका का उद्भव कब और कैसे हुआ, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन वर्तमान समय में इस विधा को उभारने और विकसित करने का महत्वपूर्ण कार्य डॉ. जनकराज शर्मा ने किया है। उन्होंने जनिका को वर्तमान संदर्भों के अनुरूप नया स्वरूप देने के साथ-साथ उसके शिल्प, अभिव्यक्ति और भावपक्ष को भी समृद्ध किया है।
जनिका सामान्यतः तीन पंक्तियों की सरल संरचना वाली काव्य-विधा है। इसकी पहली पंक्ति में एक, दूसरी में दो और तीसरी में तीन वर्णों की संरचना मानी जाती है। इसे दो पंक्तियों में भाव की स्थापना तथा तीसरी पंक्ति में कलात्मकता अथवा अर्थ की गंभीरता के साथ पूर्ण किया जाता है। इस विधा में मुहावरों, प्रतीकों, व्यंग्य और अलंकारों के माध्यम से नए प्रयोगों की पर्याप्त संभावनाएं हैं।
सच कहा जाए तो सरल दिखाई देने वाली जनिका अपने भीतर काफी जटिलता समेटे हुए है। यह ‘गागर में सागर’ भरने की प्रवृत्ति वाली विधा है और आधुनिक समय में सशक्त एवं संक्षिप्त अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में उभर रही है।
इसी जनिका-विधा पर आधारित डॉ. गौरी अरोड़ा का जनिका संग्रह ‘कल्पनाएँ उभरने लगी हैं’ साहित्य-जगत में अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराता है। डॉ. गौरी अरोड़ा पेशे से प्राध्यापक हैं और हृदय से सरल एवं भावनात्मक कवयित्री हैं। उनकी रचनात्मक अभिव्यक्ति में रिश्तों, भावनाओं और दर्शन का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
एस. जैन पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित यह 120 पृष्ठीय संग्रह 654 जनिकाओं का संकलन है। लेखिका ने अपनी मां की ममतामयी उपस्थिति को स्मरण करते हुए पुस्तक उन्हें समर्पित की है। पुस्तक की भूमिका डॉ. जनकराज शर्मा ने लिखी है।
पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर ही लेखिका ने जनिका की परिभाषा काव्यात्मक ढंग से प्रस्तुत करते हुए अपने सृजन का शुभारंभ किया है—
जनिका
कहलाती है
त्रिपंक्तिबद्ध पूर्ण रचना।
पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर छह जनिकाओं को इस प्रकार व्यवस्थित किया गया है, जैसे गीता के अध्यायों में श्लोक अपने भीतर जीवन और दर्शन को समेटे रहते हैं।
मां के प्रति ममता और समर्पण
भावना के बिना संसार सूखे वृक्ष के समान है। परिवार रूपी वटवृक्ष में मां उसकी जड़ों के समान होती है। डॉ. गौरी अरोड़ा ने अपनी मां को पुस्तक समर्पित कर उनकी ममतामयी उपस्थिति को जनिका में भी स्थान दिया है—
माँ
मूरत है
अगाध स्नेह की।
यह छोटी-सी जनिका मां के प्रति असीम स्नेह और श्रद्धा को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करती है।
प्रकृति से प्रेरणा
लेखिका ने प्रकृति को भी अपनी अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण आधार बनाया है। प्रकृति के माध्यम से वह मनुष्य को संघर्ष और संकल्प की प्रेरणा देती हैं—
आसमान
झुका देना
अपनी जिद से।
इसी प्रकार वह मनुष्य की दृढ़ता और सामर्थ्य को रेखांकित करते हुए लिखती हैं—
पहाड़
हिला दो
फौलादी बाहों से।
इन जनिकाओं में प्रकृति केवल दृश्य नहीं, बल्कि जीवन-संघर्ष में प्रेरणा देने वाली शक्ति बनकर सामने आती है।
संघर्ष से मुकाबले का संदेश
जीवन की कठिनाइयों से भागने के बजाय उनका सामना करने का संदेश भी संग्रह में प्रभावी रूप से दिखाई देता है—
भगाना
क्यों है
मुश्किलों से डरकर।
वहीं अपने जीवन के संघर्षों को भी कवयित्री सहज शब्दों में अभिव्यक्त करती हैं—
आंधियां
झेली हैं
वक्त की बहुत।
इन पंक्तियों में संघर्ष, धैर्य और जीवन के अनुभवों की गहरी छाप दिखाई देती है।
नारी शक्ति की मुखर अभिव्यक्ति
डॉ. गौरी अरोड़ा की रचनाओं में नारी के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण भी दिखाई देता है। वह नारी की कोमलता के साथ उसकी आंतरिक शक्ति को रेखांकित करती हैं—
नारी
कोमल है
पर कमजोर नहीं।
कम शब्दों में कही गई यह बात नारी की अस्मिता, आत्मविश्वास और सामर्थ्य को प्रभावशाली ढंग से सामने रखती है।
साहित्य का दायित्व
कवयित्री साहित्य को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं मानतीं, बल्कि उसे समाज और व्यक्ति के मार्गदर्शन का साधन भी मानती हैं। वह लिखती हैं—
साहित्य
दर्पण है
और पथप्रदर्शक भी।
यह जनिका साहित्य की भूमिका को बेहद संक्षिप्त और सारगर्भित ढंग से परिभाषित करती है।
डॉ. गौरी अरोड़ा एक संवेदनशील कवयित्री के रूप में भावों की नाव प्रवाहित करती हैं और दर्शन की दृष्टि से पाठक का मार्गदर्शन भी करती हैं। कहीं वह नारी-जीवन की आवाज बनती हैं, तो कहीं प्रेम की पतंग बनकर विरह की अग्नि में जलती हुई दिखाई देती हैं।
डॉ. चंद्रदत्त शर्मा ‘चंद्रकवि
‘कल्पनाएँ उभरने लगी हैं’ केवल जनिकाओं का संग्रह नहीं, बल्कि जीवन, रिश्तों, प्रकृति, संघर्ष, नारी-शक्ति, प्रेम और दर्शन से जुड़े विविध भावों का संक्षिप्त लेकिन प्रभावशाली दस्तावेज है। डॉ. गौरी अरोड़ा ने अत्यंत कम शब्दों में भावों की व्यापक दुनिया को समेटने का सफल प्रयास किया है।
यह जनिका संग्रह भावनाओं के परागकोष से महकता हुआ ऐसा मकरंद है, जो पाठक के मानस-पटल पर स्मृतियों और संवेदनाओं की खुशबू छोड़ जाता है। सरल भाषा, गहन भाव और संक्षिप्त अभिव्यक्ति के कारण यह संग्रह जनिका-विधा के पाठकों के लिए विशेष रूप से पठनीय है।
पुस्तक की लेखिका डॉ. गौरी अरोड़ा हैं, जबकि इसकी समीक्षा डॉ. चंद्रदत्त शर्मा ‘चंद्रकवि’ ने की है।