लोकसंस्कृति और साहित्य से जुड़ा रहा परिवार :
डॉ. चंद्रदत्त शर्मा का परिवार लंबे समय से लोककला, लोकसंगीत और साहित्यिक संस्कारों से जुड़ा रहा है। उनके दादाजी हरियाणवी रागनियों पर घड़वा बजाने में दक्ष थे, जबकि उनके दादा के सगे भाई
रतिराम मास्टर अपने समय के प्रसिद्ध लोककवि रहे। उनके शिष्यों में आँचरा वाले
जगदीश चंद्र वत्स जैसे प्रतिष्ठित लोककवि भी शामिल रहे हैं।
परिवार की इसी सांस्कृतिक धारा को आगे बढ़ाते हुए पंडित मायाचंद के पुत्र **श्रीदत्त शर्मा** ने लोकगायन के क्षेत्र में विशेष पहचान बनाई। वे मधुर स्वर के धनी लोकगायक थे तथा रागनियों के साथ-साथ घड़वा, बैंजो और हारमोनियम जैसे वाद्य यंत्रों में भी पारंगत थे। उन्होंने गांव के अनेक युवाओं को संगीत व वाद्य-यंत्रों का प्रशिक्षण देकर सांस्कृतिक चेतना को मजबूत किया।
बचपन से साहित्य के प्रति रहा विशेष लगाव :
डॉ. चंद्रदत्त शर्मा ‘चंद्रकवि’ को बचपन से ही साहित्य, कविता और सृजनात्मक लेखन में गहरी रुचि थी। विद्यालयी जीवन में ही उन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचय देना शुरू कर दिया था। पांचवीं कक्षा में उन्होंने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की एक कविता का हरियाणवी अनुवाद किया। आठवीं कक्षा में निबंध लेखन प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया तथा किशोरावस्था में कहानियां और कविताएं लिखना प्रारंभ कर दिया।
उच्च शिक्षा के दौरान उनकी साहित्यिक प्रतिभा और निखरती गई। उनकी रचनाएं महाविद्यालयीन पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं तथा बाद में वे आकाशवाणी रोहतक से भी जुड़े। निरंतर साहित्य-साधना और सामाजिक सरोकारों के माध्यम से उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई तथा अनेक साहित्यकारों को मंच प्रदान किया।
साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ा रहा अगला परिवार :
डॉ. शर्मा की साहित्यिक परंपरा आज उनकी अगली पीढ़ी में भी दिखाई देती है। उनकी पुत्री
शैली शर्मा हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में कविता एवं लघुकथा लेखन के माध्यम से अपनी रचनात्मक पहचान बना रही हैं। उनके नाम पर स्थापित
‘शैली साहित्यिक मंच’ साहित्यिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।
उनकी पत्नी
कविता शर्मा भी साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादन और लेखन कार्यों से जुड़ी रही हैं। वहीं पुत्र
देवदत्त शर्मा ने भी कम आयु में अपनी कल्पनाशक्ति के बल पर लेखन प्रतिभा का परिचय दिया। इस प्रकार पूरा परिवार साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
शिक्षा, शोध और साहित्यिक नेतृत्व :
डॉ. चंद्रदत्त शर्मा ने प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव में प्राप्त की तथा उच्च माध्यमिक शिक्षा रोहतक के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय से पूरी की। साहित्य के प्रति गहरे लगाव के कारण उन्होंने उच्च शिक्षा में हिंदी विषय को अपनाया और बाद में
महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक से हिंदी विषय में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। वे अपने गांव के पहले शोधार्थी बने जिन्होंने डॉक्टरेट की उपाधि अर्जित कर क्षेत्र का गौरव बढ़ाया।
उन्होंने साहित्यकारों को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से
‘शैली साहित्यिक मंच’ की स्थापना की। इसकी प्रक्रिया वर्ष 2015 में प्रारंभ हुई और मार्च 2016 में यह मंच औपचारिक रूप से पंजीकृत हुआ। आज यह मंच नवोदित और वरिष्ठ साहित्यकारों के बीच एक महत्वपूर्ण साहित्यिक सेतु के रूप में कार्य कर रहा है।
साहित्य के साथ सामाजिक सरोकार भी :
डॉ. शर्मा केवल साहित्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सामाजिक सेवा में भी सक्रिय रहे हैं। वे 16 बार रक्तदान कर चुके हैं। आध्यात्मिक चिंतन की दिशा में भी उनकी विशेष रुचि रही है और उन्होंने प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय से आत्मा और परमात्मा के ज्ञान का अध्ययन किया।
वे कविता, कहानी, नाटक, निबंध, लेख, लघुकथा, छंद, हरियाणवी रागनी तथा शोध लेखन जैसी अनेक साहित्यिक विधाओं में समान रूप से दक्ष हैं। उनकी रचनाओं में सामाजिक विषमताओं, पारिवारिक संबंधों, नारी संवेदनाओं, माता-पिता के प्रति सम्मान और राष्ट्रप्रेम की भावनाओं का प्रभावशाली चित्रण देखने को मिलता है।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान :
डॉ. चंद्रदत्त शर्मा ‘चंद्रकवि’ अब तक 50 से अधिक पुस्तकों का सृजन कर चुके हैं तथा उन्हें लगभग 370 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उन्होंने लगभग 12 वर्षों तक आकाशवाणी रोहतक से काव्यपाठ किया, जबकि उनकी रचनाएं दूरदर्शन हिसार से भी प्रसारित होती रही हैं।
इसके अतिरिक्त वे विभिन्न साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े रहे हैं और साहित्यिक पत्रिकाओं के माध्यम से नि:स्वार्थ सेवाएं प्रदान करते रहे हैं। वर्तमान में वे अपने साहित्यिक योगदान को आगे बढ़ाते हुए अपने भाई
सोमदत्त शर्मा को समर्पित पत्रिका
‘शब्द सोम’ के प्रकाशन से भी जुड़े हुए हैं।
साहित्यिक संस्कारों की जीवंत मिसाल :
डॉ. चंद्रदत्त शर्मा ‘चंद्रकवि’ और उनका परिवार इस बात का जीवंत उदाहरण है कि साहित्यिक संस्कार, यदि पीढ़ियों तक संरक्षित और विकसित किए जाएं, तो वे समाज को नई दिशा देने की क्षमता रखते हैं। उनका जीवन और साहित्यिक योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।