कार्यक्रम के दौरान डॉ. मधुकांत द्वारा रचित पुस्तक ‘महर्षि दयानंद के प्रेरक प्रसंग’ का लोकार्पण किया गया। वहीं, डॉ. अंजना गर्ग के संपादन में तैयार ‘स्वैच्छिक रक्तदान की ओर’ पंपलेट का भी विमोचन किया गया। इस पंपलेट का उद्देश्य लोगों को स्वैच्छिक रक्तदान के प्रति जागरूक करना है। साहित्य और सामाजिक सरोकारों के इस समन्वय की उपस्थित साहित्यकारों एवं विद्वानों ने सराहना की।
साहित्य संवर्धन के लिए सुभाष चंद्र बजाज सम्मानित
इस विशेष अवसर पर
‘ऋषि की आवाज’ समाचार पत्र के चीफ एडिटर सुभाष चंद्र बजाज को रोहतक में साहित्य संवर्धन के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में साहित्यिक पुस्तकों के प्रकाशन तथा समाचार पत्रों में साहित्यिक रचनाओं के प्रकाशन को लेकर भी विस्तार से चर्चा हुई।
प्रोफेसर विपिन गुप्ता से साहित्यिक पुस्तकों के प्रकाशन तथा सुभाष चंद्र बजाज से समाचार पत्र में रचनाओं के प्रकाशन की संभावनाओं को लेकर साहित्यकारों ने विचार-विमर्श किया।
विभिन्न विषयों पर प्रस्तुत हुईं रचनाएँ
कार्यक्रम का शुभारंभ
कृष्ण लाल ने सावन पर आधारित मधुर गीत की प्रस्तुति से किया। इसके बाद
प्रो. शाम लाल कौशल ने जीवन के विभिन्न आयामों को स्पर्श करती कविता प्रस्तुत की।
डॉ. राजेंद्र अवस्थी ने ‘लिविंग रिलेशनशिप’ जैसे समकालीन विषय पर अपने दोहों के माध्यम से सार्थक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।
मलिक साहब ने ‘सुन लो बात सुनाऊँ मैं’ कविता के माध्यम से 23 अगस्त के ऐतिहासिक एवं सामाजिक महत्व को रेखांकित किया। वहीं
पवन गहलौत ने ‘हम सुख के मारे बेचारे’ कविता की ओजपूर्ण प्रस्तुति दी।
डॉ. निधि राठी ने हरियाणवी भाषा में मां की ममता और वात्सल्य को अपनी रचना के माध्यम से अभिव्यक्त किया।
पूनम भोला ने चिड़िया से संवाद के माध्यम से बच्चों को आत्मनिर्भर बनने का संदेश दिया।
करण सिंह ने हरियाणवी ग़ज़ल
‘जिस मानस का मन काबू न्याय से’ प्रस्तुत कर खूब तालियां बटोरीं।
सामाजिक सरोकारों और महिला विमर्श पर भी हुई रचनात्मक अभिव्यक्ति
डॉ. तरुणा सचदेवा ने ‘लड़ता कौन है मजहब के नाम पर’ कविता के माध्यम से धार्मिक संकीर्णता और सामाजिक विभाजन पर गंभीर सवाल उठाए।
ममता शर्मा ने महिला विमर्श को केंद्र में रखते हुए अपनी रचना प्रस्तुत की, जबकि
आशा बाल्यान की रचना ‘इत्र की महक’ ने कार्यक्रम में भावनात्मक वातावरण पैदा किया।
एकता कोचर ने ‘मेघदूत मंच’ के संबंध में विस्तार से जानकारी साझा की और इसके बाद ‘स्माइल प्लीज़’ शीर्षक से मर्मस्पर्शी लघुकथा प्रस्तुत की। वहीं
अर्चना कोचर ने ‘जग जननी माई’ रचना के माध्यम से संतान के व्यवहार और मां के भावनात्मक संसार को प्रभावशाली ढंग से सामने रखा।
साहित्य को सामाजिक चेतना से जोड़ने का संकल्प
काव्य गोष्ठी में उपस्थित सभी रचनाकारों ने अपनी साहित्यिक प्रस्तुतियों के माध्यम से साहित्य को
सामाजिक चेतना, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का संकल्प दोहराया।
कार्यक्रम के समय पर आरंभ होने पर
डॉ. मधुकांत ने सभी साहित्यकारों, रचनाकारों और अतिथियों का धन्यवाद एवं आभार व्यक्त किया। गोष्ठी ने साहित्य, सामाजिक जागरूकता और मानवीय संवेदनाओं के बीच मजबूत संबंध को रेखांकित किया।