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Saturday, June 20, 2026

कला-साहित्य

तपती धूप में सुकून की तलाश: मेघना वीरवाल की कविता ने जीवन संघर्ष और आशा का दिया गहरा संदेश

राजस्थान की युवा कवयित्री मेघना वीरवाल की कविता “तपती धूप” में जीवन की बेचैनी, शांति की खोज और आत्मिक सुकून का मार्मिक चित्रण राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के आकोला क्षेत्र के गाडरियावास की निवासी युवा कवयित्री मेघना वीरवाल द्वारा लिखी गई कविता “तपती धूप” इन दिनों साहित्य प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बन रही है। यह कविता केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन की भागदौड़, मानसिक थकान और आत्मिक शांति की तलाश को बेहद संवेदनशील तरीके से अभिव्यक्त करती है।

माँ की ममता और त्याग को समर्पित भावुक कविता ने छुआ दिल, लेखिका मेघना वीरवाल की रचना हो रही सराही

“माँ.. तेरे लिए वो शब्द कहाँ से लाऊँ” — कविता में छलका एक बेटी का दर्द, सम्मान और संवेदनाएँ ! राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले की युवा लेखिका मेघना वीरवाल की मार्मिक कविता “माँ..” इन दिनों साहित्य प्रेमियों के बीच विशेष चर्चा का विषय बनी हुई है। इस कविता में एक बेटी ने माँ के त्याग, प्रेम, संघर्ष और मौन बलिदान को बेहद भावनात्मक शब्दों में व्यक्त किया है। कविता न केवल मातृत्व की महानता को दर्शाती है, बल्कि समाज में महिलाओं के योगदान और उनकी अनदेखी पीड़ा को भी उजागर करती है।

ऑपरेशन सिंदूर : प्रेम, प्रतिशोध और बलिदान की अमर गाथा - डॉ. मधुकांत

आतंकवाद की अंधेरी सुरंग में प्रेम की अंतिम लौ बनकर जली कात्या, देश की रक्षा के लिए दी सर्वोच्च आहुति ! कश्मीर की वादियों में जब सूरज की पहली किरण पीर पंजाल की बर्फीली चोटियों को स्पर्श करती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति ने स्वर्णिम चादर ओढ़ ली हो। अप्रैल की वह सुहानी सुबह भी कुछ ऐसी ही थी। हवा में चिनार के पत्तों की सरसराहट थी, केसर की हल्की महक थी और डल झील के शांत जल पर वसंत अपनी रंगीन छटा बिखेर रहा था। लेकिन इस मनोहारी सौंदर्य के पीछे एक भयावह सन्नाटा भी छिपा था, जो आने वाले तूफ़ान की चेतावनी दे रहा था।

डॉ. मधुकांत की कहानियों में समकालीन विमर्श: समाज, राजनीति और मानवीय संवेदनाओं का गहरा विश्लेषण

आधुनिक कथाकार डॉ. मधुकांत की रचनाएँ सामाजिक विसंगतियों, नैतिक पतन और बदलते मूल्यों पर करती हैं तीखा प्रहार । साहित्य केवल समाज का दर्पण ही नहीं होता, बल्कि वह उसकी विसंगतियों को उजागर करने वाला एक सशक्त माध्यम भी है। प्रख्यात साहित्यकार डॉ. मधुकांत की कहानियाँ इसी परंपरा को आगे बढ़ाती हैं। उनकी रचनाओं में आधुनिक समाज की जटिलताएँ, बदलते नैतिक मूल्य, राजनीतिक विडंबनाएँ और मानवीय संवेदनाओं का गहरा अंतर्द्वंद्व अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उभरकर सामने आता है।

सत्ता का 'मास्टरप्लान': नेता ख्यालीराम ने बताया कैसे हर सरकार में बना रहे परिवार का दबदबा

राजनीति में विचारधारा से ऊपर जब 'परिवारवाद' और 'स्वार्थ' हावी होता है, तो नैतिकता के मायने बदल जाते हैं। डॉ. मधुकांत की लघुकथा 'अपना राज' राजनीतिक परिवारों के उस पर्दे के पीछे के सच को उजागर करती है, जहाँ दुश्मन सिर्फ जनता के सामने बना जाता है।

आसमान छूते चांदी के भाव ने तोड़ा पिता का सपना: डॉ. मधुकांत की मार्मिक लघुकथा 'चांदी'

बढ़ती महंगाई केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह एक आम आदमी के उन सपनों को भी निगल जाती है जो वह बरसों से संजोता है। साहित्यकार डॉ. मधुकांत की लघुकथा 'चांदी' इसी कड़वी सच्चाई को बयां करती है।

“माँ – रूह से रूह तक” : मातृत्व की आत्मिक गहराई को उजागर करती अर्चना कोचर की भावपूर्ण रचना

मनुष्य के जीवन में यदि किसी का स्थान सर्वोपरि है, तो वह ‘माँ’ है। लेखिका अर्चना कोचर की रचना “माँ – रूह से रूह तक” मातृत्व के इसी अनंत, आत्मिक और गहरे स्वरूप को बेहद संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है।

23 भजनों में समाई सत्यनारायण कथा—पढ़ें डॉ. अशोक जाखड़ की अनोखी भजनावली "श्री सत्यनारायण भगवान कथा दर्शन"

मानव जीवन को आध्यात्मिकता से जोड़ने वाली भक्ति परंपरा को नई अभिव्यक्ति देने वाली पुस्तक "‘श्री सत्यनारायण भगवान कथा दर्शन’" इन दिनों साहित्य और धार्मिक जगत में विशेष चर्चा का विषय बनी हुई है। भक्तकवि डॉ. अशोक कुमार जाखड़ द्वारा लिखित इस भजनावली में भगवान श्री सत्यनारायण की कथा, भक्ति और दर्शन को सरल और प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत किया गया है।

साहित्यकार डॉ. मधुकांत का ‘जल गीत’ बना जल संरक्षण का संदेशवाहक

पानी की बढ़ती कमी और पर्यावरण संकट के दौर में रोहतक के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. मधुकांत की कविता "जल गीत" समाज को जल के महत्व का सशक्त संदेश देती नजर आती है। लोकधुन की लय और सहज शब्दों में रची यह कविता केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति ही नहीं, बल्कि जल संरक्षण के प्रति जागरूकता का प्रभावी आह्वान भी है।

तेरी दासी: समर्पण और नारी शक्ति का अद्भुत चित्रण

डॉ. नवलपाल प्रभाकर दिनकर की कविता “तेरी दासी” प्रेम, समर्पण और नारी की आंतरिक शक्ति का अनूठा संगम है। यह कविता न केवल भावनात्मक रूप से गहराई लिए हुए है, बल्कि पाठक को सोचने और महसूस करने पर मजबूर करती है।

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